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शूटर्स दादियों पर बनी फ़िल्म सीधे 'सांड की आंख' पर निशाना लगाती है !

शूटर्स दादियों पर बनी फ़िल्म सीधे सांड की आंख पर निशाना लगाती है !
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Syed Hussain

Published: 25 Oct 2019 12:51 PM GMT

बॉलीवुड की चर्चित फ़िल्म सांड की आंख शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई, जिसका इंतज़ार सिर्फ़ फ़िल्म प्रेमियों को ही नहीं था बल्कि खेल प्रेमियों के लिए भी इस मूवी का महत्व अलग है। असल में ये फ़िल्म उत्तर प्रदेश के बाग़पत के एक छोसे से गांव जोहरी की रहने वाली दो दादियों के जीवन पर आधारित है, जिन्होंने बुढ़ापे में शूटींग शुरू की और फिर अपने प्रदर्शन से सभी को हैरान कर दिया।

नोट: ये रिव्यू सिर्फ़ फ़िल्म में दिखाए और बताए गए खेल से संबंधित पहलूओं पर है, अदाकारी, स्क्रीनप्ले, निर्देशन या फ़िल्म के तकनीकी हिस्सों से इसका कोई सरोकार नहीं है।

EXCLUSIVE: जो आपको फ़िल्म में नहीं मिला, वह यहां जानिए !

https://youtu.be/wnrJXX8m9PY

चंद्रो तोमड़ (87 साल) और प्रकाशी तोमड़ (82 साल) इन दो शूटर्स की बायोपिक है 'सांड की आंख' लेकिन अच्छी बात ये है कि इसे देखने के बाद आपको ये अहसास भी होगा कि भारत में खेल को लेकर आज भी महिलाओं को काफ़ी जद्दोजहद करनी होती है। फ़िल्म की शुरुआत 1999 से होती है, जब दोनों दादियां चंडीगढ़ में पहली बार बुज़ुर्गों की हो रही शूटिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लेने पहुंचती हैं। उनके साथ फ़िल्म में डॉ यशपाल का किरदार निभा रहे विनीत कुमार सिंह होते हैं, असल ज़िंदगी में डॉ राजपाल सिंह ही वह शख़्स हैं जिनकी अकादमी से प्रकाशी तोमड़ और चंद्रो तोमड़ निकल कर बाहर आईं थीं। अच्छा तब लगता है कि रिसर्च टीम ने हरेक बारीकी का ध्यान रखते हुए उस प्रतियोगिया में दोनों दादियों को उस आईजी को हराते हुए भी दिखाया गया है, जिन्हें असली ज़िंदगी में भी तोमड़ दादियों ने हराया था। इस दौरान एक ग़लती भी सामने दिखती है, जब वहां लगे पोस्टर में 1999 के काफ़ी बाद भारत के लिए पदक जीतने वाले एक मशहूर शूटर की तस्वीरें नज़र आती हैं।

https://twitter.com/bhumipednekar/status/1182359583345524744?s=20

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लेकिन आपको थोड़ी मायूसी तब लगेगी जब डॉ राजपाल सिंह की परेशानी और किस तरह से उन्होंने जोहरी में शूटींग अकादमी की स्थापना की थी, वह नहीं दिखाया गया है। न ही इस बात का कोई ज़िक्र है कि अकादमी एक मस्जिद के अंदर शुरू हुई थी। बहरहाल, ढाई घंटों के अंदर फ़िल्म को पूरा करने के लिए शायद निर्देशक ने इसका ध्यान नहीं रखा होगा। हालांकि, फ़िल्म में ये बताने की कोशिश भी की गई है कि शूटर्स को दूसरे खेलों की तरह आक्रामक या जोश में नहीं रहना चाहिए बल्कि अगर आपको 'सांड की आंख' (बुल्स आई) पर निशाना लगाना है तो फिर शांत और टेंशन फ़्री रहना ज़रूरी है।

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प्रकाशी तोमड़ और चंद्रो तोमड़ की मुश्किलों से भरे सफ़र के साथ साथ किस तरह उन्होंने सीमा तोमड़ और शेफ़ाली तोमड़ को शूटींग के लिए तैयार कराया और उनके लिए सबसे लड़ने के लिए भी खड़ी हुईं। ये देखकर प्रेरणा मिलती है, साथ ही साथ इस तरह की फ़िल्म हम सभी को परिवार और अपने बच्चों के साथ देखनी चाहिए, ताकि सभी को समझ में आ सके कि जो खिलाड़ी देश के लिए पदक लाते हैं या लाने के लिए खेलते हैं, असल में उन्हें वहां तक पहुंचने के लिए कितनी चुनौतियां और कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। और हम या आप एक झटके में उनके असफल होने या चूकने पर उन्हें न जाने क्या क्या कह जाते हैं।

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